पहली पुतली रत्नमंजरी : राजा विक्रमादित्य के जन्म और सिंहासन प्राप्ति की कहानी

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पहली पुतली रत्नमंजरी: एक राज्य था जिसका नाम था अम्बावती, वहाँ के राजा गंधर्वसेन ने हर वर्ण की स्त्री से कुल चार विवाह किये थे और उसकी ब्राह्मण पत्नी से हुए पुत्र का नाम ब्राह्मणीत था, क्षत्राणी के तीनों पुत्रों का नाम- शंख, विक्रम तथा भर्तृहरि था, वैश्य पत्नी के पुत्र का नाम चन्द्र था तथा चौथी पत्नी जो शूद्र थी उसने धन्वन्तरि नामक पुत्र को जन्म दिया। ब्रह्मणीत को गंधर्वसेन ने अपना उतराधिकारी बनाया, पर वह अपनी ज़िम्मेदारी को निभा नहीं सका और राज्य से चला गया और कुछ समय इधर-उधर भटकने के बाद धारानगरी राज्य में ऊँचा पद प्राप्त किया और उसने एक दिन राजा का वध करके ख़ुद राजा बना। काफी अरसे के बाद उसने उज्जैन लौटने का विचार किया, लेकिन उज्जैन में ही कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।

राजा कहीं विक्रम को योग्य समझकर उसे अपना उत्तराधिकारी न घोषित कर दें, इसलिए क्षत्राणी के बड़े पुत्र शंख ने अपने पिता का एक दिन सोते हुए वध करके स्वयं को राजा घोषित कर दिया। पिता की हत्या की खबर आग की तरह पूरे राज्य मे फैल गई और उसके सभी भाई प्राण बचाने के लिए भाग गए। विक्रम को छोड़कर बाकी सभी मार डाले गए, बाद में शंख को पता चला कि घने जंगल में सरोवर के बगल में एक कुटिया में विक्रम रह रहा है तथा फल आदि खाकर घनघोर तपस्या कर रहा है और तब शंख उसे मारने की योजना बनाने लगा और एक तांत्रिक को उसने अपने षडयंत्र में शामिल कर लिया।

जिसके बाद तांत्रिक ने योजना बनाई की विक्रम को भगवती आराधना के लिए राज़ी कर के तथा माँ भगवती के आगे विक्रम के सर झुकाते ही शंख अपनी तलवार से वार करके उसकी गर्दन काट डालेगा मगर विक्रम ने खतरे को भाँप लिया और तांत्रिक को सर झुकाने की विधि समझाने को कहा, शंख मन्दिर में ही छिपा हुआ था। उसने विक्रम की जगह तांत्रिक की हत्या कर दी और विक्रम ने शंख की तलवार छीन कर उसका सर धड़ से अलग कर दिया और शंख की मौके पर ही मौत हो गई, जिसके बाद उसका राज्यारोहण हुआ और एक दिन शिकार के लिए विक्रम जंगल गए और घने जंगल में मृग का पीछा करते-करते सबसे अलग होकर बहुत दूर चले गए उन्हें जंगल में एक महल दिखा जिसके बाद पता चला कि वह महल तूतवरण का है जो कि राजा बाहुबल का दीवान है। तूतवरण ने बात करते करते ही कहा कि विक्रम बड़े ही यशस्वी राजा बन सकते हैं, अगर राजा बाहुबल खुद उनका राजतिलक करें और तूतवरण ने कहा कि भगवान शिव द्वारा प्रदत्त अपना स्वर्ण सिंहासन अगर बाहुबल विक्रम को दे दें तो विक्रम आगे चल कर चक्रवर्ती सम्राट बन सकते हैं जिसके बाद बाहुबल ने विक्रम का न केवल राजतिलक किया, बल्कि खुशी-खुशी उन्हें स्वर्ण सिंहासन भी भेंट कर दिया और कुछ समय प्रश्चात राजा विक्रमादित्य चक्रवर्ती सम्राट बन गए।

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